अध्याय 34 - वायु

मार्गोट की नज़र से

उनकी हँसी मेरे कानों में ज़ोर से और चुभती हुई लगी—जैसे जंग लगा चाकू ब्लैकबोर्ड पर घिसट रहा हो।

वो सीधे मेरी उस पतली‑सी शांति पर वार कर रही थी, जिसे मैं कोबान से हुई अपनी कुछ हद तक सफल बातचीत के बाद बड़ी मुश्किल से संभालकर रखे हुए थी…

मैं बस वहीं बेंच पर कोबान के पास जमी रह ...

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